
देश के प्रतिष्ठित व्यावसायिक घरानों को जब सरकारी ताले खोलने होते हैं, तो उन्हें इन हुनरमंद चाबियों की जरूरत होती है। हुनरमंद चाबियां यानी 'कॉर्पोरेट जुगाड़'। ऐसे जुगाड़ जो किसी भी बड़ी कंपनी में ना नहीं सुनने वाले शीर्ष प्रबंधकों की हर व्यावसायिक मांग को पूरा करवाते हैं। सरकारी 'जुगाड़' लगाने, फाइलों पर चलने वाली ऐसी कलम जो करोड़ों का नुकसान करवा सकती है को मैनेज करने, देश चलाने वाले नेताओं से शीर्ष कॉर्पोरेटर्स की मुलाकातें करवाकर अहम फैसले करवाने और लॉबिंग में इनकी सबसे अहम भूमिका होती है। मीडिया से लेकर हर उस संसाधन का इस्तेमाल यह बेहतरी से करना जानते हैं, जिनकी जरूरत कॉर्पोरेट घरानों को कदम-कदम पर पड़ती है। अंबानी, टाटा सहित बड़े राजनेता इनके मार्गदर्शन पर अपने फैसले लेते और बदलते हैं।
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badhaai
वैसे प्रवीण जी, आज़ादी के बाद हर क्षेत्र में इस तरह के लोगों की एक पौध पनपी है. मुझे याद आता है कि मैं जब सेवा निवृत्त हुआ था तो मेरे पास भी नौकरी के अनेक प्रस्ताव आए थे. पद नाम चाहे जो भी हो, नौकरी देने वालों की अपेक्षा यही थी कि मैं उनका 'मददगार' बनूं. अगर थोड़ा घटिया शब्द काम लेने की इच्छा हो तो दलाल या दल्ला भी कह सकते हैं.